
दोस्तों निजी स्कूल बनाम सरकारी स्कूल का तीसरा एपिसोड लेकर आपके सामने फिर से हाजिर है क्विक न्यूज़। आज की प्रमुख चर्चा होगी फीस के नाम पर किस प्रकार धांधली की जाती है। किस प्रकार लूट की जाती है। अभी दोस्तों पिछले सोमवार को ही भगत सिंह यूथ ब्रिग्रेड द्वारा एक ज्ञापन उपखण्ड अधिकारी को दिया गया था। इसमें से डूंगरगढ़ तहसील के बग्गा ग्राम निवासी श्री शुभकरण डूडी ने अपने छोटे भाई का एडमिशन यहां की प्रसिद्ध डिफेंस एकेडमी में करवाया। और रुपए 80000 जमा करवाऐ।

इसकी रसीद आप अपनी पूरी स्क्रीन पर देख सकते हैं साथ ही इनकी इसमें से ₹20000 उन्होंने केश दिए और बाकी उन्होंने फोन पे किए थे। पूरा घटनाक्रम उनकी खुद की आवाज में भी सुन सकते हैं। दोस्तों यहां गौरतलब है कि प्रवेश के समय वादा किया जाता है कि यदि आपको पसंद नहीं आता है यहां का खान पान,रहन-सहन तो फीस वापस रिफंड कर दी जाएगी। लेकिन फीस रिफंड करने के लिए अभिभावक को किस तरह पापड़ बेलने पड़ते हैं आप देख सकते हैं।

दरअसल यहां एडमिशन होने के तुरंत तीन दिन बाद ही छात्र की माताजी को पैरालाइसिस हो गया था तो उसका जाना जरूरी था। अब ज़ब बड़ा भाई दिल्ली में नौकरी करता है तो मां के पास छोटे भाई का रहना लाजमी है। तो इन लोगों की पारिवारिक स्थिति को ऐसी नहीं थी कि भाई को घर से दूर रखा जासके। जब फीस वापस मांगी तो सारी कहानी आपके सामने है। अंत में श्री शुभ करण जी को पुलिस की शरण लेनी। पड़ी देखी प्रार्थना पत्र अपनी फुल स्क्रीन पर।

आपने पूरा घटना क्रम श्री शुभकरण डूडी की खुद की आवाज में भी सुन लिया है। बहरहाल भगत सिंह यूथ ब्रिगेड ने उनके इस लूट के खिलाफ लड़ाई छेड़ दी है। यहां यह भी गौरतलब है की यही डिफेंस एकेडमी आज एक शिक्षा की बहुत बड़ी दुकान (स्कूल )का उद्घाटन भी करने वाली है। दोस्तों इन संस्थाओं का नाम हम यहां नहीं बताएंगे या तो खुद ही आपको समझ में आ जाएगा अन्यथा उनकी रसीद में स्पष्ट ही लिखा हुआ है इन संस्थाओं का नाम।

वहीं एक और मामला भी क्विक न्यूज़ के सामने लगभग 2 साल पहले आया था। यहीं के एक बड़ी शिक्षा की दुकान (स्कूल) में सीकर की एक छात्रा अंकिता शर्मा का एडमिशन हुआ था। उसे समय भी क्विक न्यूज़ में बहुत अच्छा कवरेज भी किया था। बच्ची को यहां का खाना रास नहीं आया और तीसरे दिन ही उसके पिताजी उसे लेने आ गए। लेकिन फीस वापस नहीं दी गई।

अभिभावकों के अनुसार कई बार संपर्क करने के बाद डेढ़ साल की अवधि बीत जाने के बाद 50000 में से ₹30000 दो किस्तों में एक बार 10000 दिए गए और दूसरी बार 20000। आज 2 साल बीतने को है अभिभावक अभी भी बकाया रकम के लिए भटक रहे हैं। ऐसे कई मामले सामने आ चुके हैं। कई मामलों में तो अभिभावक तंग आकर चुपचाप बैठ जाते हैं। और कई मामलों में कुछ पैसा वापस करके बाकी हजम कर लिया जाता है। क्या यह सब गौरख धंधा सरकारी संस्थानों में होना संभव है। क्विक न्यूज़ के दर्शक खुद ही तय करें।
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