Wednesday , 4 February 2026

बॉलीवुड : स्वार्थो से भरी दुनिया

सिनेमा सिनेमा के आज हम लाए हैं बॉलीवुड का वह स्याह चेहरा जिसमें सिर्फ स्वार्थ ही स्वार्थ है। तो दोस्तों पिछले दिनों एक वीडियो वायरल हुआ था में एक महिला दिखाई दे रही थी कोई एनजीओ वाला उन्हें लेकर आया था एनजीओ में। और वहां पर वह भद्र महिला अपने बारे में बता रही थी। अपने आप को क्रिकेटर सलीम दुर्रानी की धर्मपत्नी बता रही थी। परवीन बाबी का अंत किसी से छुपा हुआ नहीं है। लिस्ट लंबी है दोस्तों भारत भूषण, राज किरण जैसे कई उदाहरण है जो यहां दिए जा सकते है। राज किरण का तो अभी तक कोई अता-पता ही नहीं है। मतलब जब तक यहां कोई हिट है तब तक ठीक है। वरना उनकी कीमत दो कोड़ी की भी नहीं रहती। 

               बहरहाल बात करते हैं सुपरस्टार अमिताभ बच्चन की पर्दे पर दिखने वाला यह सुपरस्टार असल जिंदगी में क्या है। आज आपको बताते हैं तो साहब यह कहानी एक घटना की नहीं है यह उस रवैये की दास्तां है जो जरूरत तक रिश्ते निभाता हैं और सफलता मिलते ही उन्हें भूल जाता है। तो सबसे पहले बात करते हैं राजीव गांधी की अमिताभ बच्चन और राजीव गांधी के बचपन के दोस्त थे इतने गहरे दोस्त की विदेशी राष्ट्र अध्यक्ष भी इनकी मिसाल देते थे। इंदिरा जी की मृत्यु के बाद अमिताभ राजीव की मदद के लिए राजनीति में आए और बीच मझदार में ही छोड़ कर चले गए। कहानी किसी से छुपी नहीं है आज लोग गांधी परिवार और उनके अलगाव की मिसाल देते हैं।

                  दूसरे नंबर पर आते हैं महमूद :- आज के चमकते सुपरस्टार बनने से पहले एक समय था जब अमिताभ बच्चन इंडस्ट्री में लगातार फ्लॉप दे रहे थे। काम लगभग बंद था, जेब हल्की थी, पहचान शून्य।उस दौर में एक आदमी था — महमूद।
कॉमेडी का बादशाह, दिल का और भी बड़ा। महमूद ने न सिर्फ़ अमिताभ को अपने घर में जगह दी, खाने में हिस्सा दिया,
बल्कि अपने परिवार की तरह रखा। जब पूरा बॉलीवुड दरवाज़े बंद कर चुका था, महमूद ने “बॉम्बे टू गोवा” में हीरो बना दिया।और वहीं से किस्मत पलटी। फिर आई “ज़ंजीर” —और अमिताभ बच्चन रातों-रात महानायक बन गए। लेकिन…जिस महमूद ने कंधा दिया, उसी महमूद की बीमारी में एक झलक तक नसीब नहीं हुई। महमूद ने मरते-मरते बस इतना कहा —
“असली पिता असली होता है…
नकली पिता, नकली ही रहता है।”
यह संवाद किसी फ़िल्म का नहीं था, यह दिल से निकली टीस थी

कादर ख़ान —

जिनके लिखे डायलॉग्स पर तालियाँ बजीं, जिनके शब्दों ने अमिताभ को अमर किया। लेकिन सांसद बनने के बाद अमिताभ बदल गए। नाम बदल गया, लहजा बदल गया, और रिश्तों का तापमान शून्य हो गया।

“मैं अमित कहता था,
मुझसे ‘सर जी’ कहलवाना चाहते थे।”
यहीं से दो पटरियों पर गाड़ी चल पड़ी —
एक तरफ़ ‘सर जी’,
दूसरी तरफ़ ‘कादर जी’।
फिर दोनों कभी एक ही फ़िल्म में नहीं मिले।

अमर सिंह –

जब एबीसीएल डूब रही थी, जब कर्ज़ सिर पर था, जब पूरा बॉलीवुड दूर खड़ा था — तब अमर सिंह साथ थे। घर में कमरा,
साथ में छाया, और हर मंच पर समर्थन। लेकिन समय बदला।
ज़रूरत ख़त्म हुई।
और रिश्ते भी।
अमर सिंह ने जाते-जाते
माफ़ी माँगी,
लेकिन सवाल ज़िंदा रह गया —
क्या मदद सिर्फ़ लेने तक ही पवित्र होती है?

🏛️ गांधी परिवार: विरासत से दूरी तक

नेहरू से शुरू हुआ रिश्ता,इंदिरा की दोस्ती,राजीव-संजय की यारी…सब कुछ था। लेकिन 1991 के बाद
सब कुछ अतीत हो गया। शादी में आख़िरी मुलाक़ात, फिर कभी साथ नहीं दिखे।

भाई, दोस्त और सहकर्मी — सब पीछे छूटे

अजिताभ बच्चन — भाई होकर भी अलग।
धर्मेंद्र — शोले देने के बाद भी दूरी।
शत्रुघ्न सिन्हा, परवीन बॉबी, प्रकाश मेहरा —
हर किसी के पास अपनी शिकायत।
इत्तेफ़ाक इतना भी नहीं होता।

📚 देव आनंद: सम्मान की प्रतीक्षा

अब बात उस घटना की
जिसने सारी कहानी को मुकम्मल कर दिया। 84 साल के देव आनंद — सदाबहार अभिनेता, जिनकी एक मुस्कान पीढ़ियाँ जिया करती थीं। उनकी किताब का लॉन्च था। वादा किया गया कि
अमिताभ आएंगे, अंबानी आएंगे, शाम यादगार होगी। लेकिन हुआ क्या? अमिताभ कुछ मिनट रुके, किताब उठाए बिना चले गए।

और बाद में… देव आनंद को ‘जलसा’ के बाहर इजाज़त का इंतज़ार करना पड़ा।
वो देव आनंद — जिन्हें कभी किसी दरवाज़े पर रुकना नहीं पड़ा था |

तो दोस्तों यह लेख न नफ़रत है,
न ईर्ष्या।
यह सवाल है —क्या सफलता के बाद कृतज्ञता भी लग्ज़री बन जाती है? क्या महानता सिर्फ़ स्क्रीन तक सीमित होती है?
और क्या जो लोग हमें ऊपर लाते हैं, उन्हें नीचे देखकर चुप रह जाना वाक़ई “बड़प्पन” कहलाता है?
सोचिए…
क्योंकि इतिहास
तालियों से नहीं,
व्यवहार से याद रखा जाता है।

अगर उन्हें पता होता कि भीतर जाने के लिएअनुमति चाहिए, तो शायद उनका दिल टूट जाता।
अच्छा हुआ यह सच्चाई उनके जीवन में सामने नहीं आई।

नोट :- कुछ अंश किसी अंजान से साभार – शुक्रिया अनजान भाई

हो सकता हे अमिताभ के प्रशंसको को मुझसे शिकायत हो लेकिन लेखनी हे चल पड़ी |

About Manoj Bhardwaj

Manoj Bhardwaj
मनोज भारद्धाज एक स्वतंत्र पत्रकार है ,जो समाचार, राजनीति, और विचार-शील लेखन के क्षेत्र में काम कर रहे है । इनका उद्देश्य समाज को जागरूक करना है और उन्हें उत्कृष्टता, सत्य, और न्याय के साथ जोड़ना है। इनकी विशेषज्ञता समाचार और राजनीति के क्षेत्र में है |

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